झारखंड आंदोलन के नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन राज्य में 3 दिनों का शोक, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया शोक।

झारखंड आंदोलन के नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन राज्य में 3 दिनों का शोक, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया शोक।
झारखंड की राजनीति और आदिवासी समाज के सबसे बड़े चेहरे शिबू सोरेन का निधन हो गया। 81 वर्षीय शिबू सोरेन पिछले कुछ समय से किडनी की बीमारी से पीड़ित थे और डॉक्टरों की देखरेख में इलाज करा रहे थे। उनके निधन की खबर मिलते ही पूरे झारखंड में शोक की लहर फैल गई है। इस दुखद घटना पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा शोक व्यक्त किया है। राज्य सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है और सरकारी कार्यालयों में अवकाश की घोषणा की गई है।
झारखंड आंदोलन के नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन जाने कब जन्में थे।
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन मांझी एक शिक्षक थे और उनके दादा चरण मांझी अंग्रेजों के जमाने में रामगढ़ रियासत के टैक्स तहसीलदार थे। उनका परिवार सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न था। शिक्षा के लिए उन्हें और उनके भाई को गांव से दूर गोला रोड स्थित एक हॉस्टल में भेजा गया। यहीं से उनके जीवन की दिशा अचानक बदल गई जब हॉस्टल में पढ़ाई के दौरान उनके पिता की हत्या कर दी गई। यह घटना शिबू सोरेन के जीवन का टर्निंग पॉइंट बनी।
झारखंड आंदोलन के नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन पिता की हत्या के बाद क्यों छोड़ी थी पढ़ाई।

झारखंड आंदोलन के नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन राज्य में 3 दिनों का शोक, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने जताया शोक।
पिता की हत्या के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए संघर्ष शुरू किया। उन्होंने महाजनों के अत्याचारों के खिलाफ ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया जिसमें वे और उनके साथी महाजनों की खेतों से जबरन धान काटकर आदिवासियों को वितरित करते थे। यह आंदोलन इतना प्रभावी हुआ कि आदिवासी समाज में शिबू सोरेन को “दिशोम गुरु” की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ होता है – देश का गुरु।
झारखंड आंदोलन के नायक पूर्व CM शिबू सोरेन का निधन : कहा से राजनीतिक शुरुआत हुई।
राजनीतिक जीवन की शुरुआत उन्होंने पंचायत चुनाव से की, लेकिन पहले प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिली। बाद में जरीडीह विधानसभा सीट से भी उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा। हिम्मत नहीं हारने वाले शिबू सोरेन ने 1980 में पहली बार दुमका से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उन्होंने 1989, 1991, 1996, 2002, 2004, 2009 और 2014 में दुमका से सांसद पद पर जीत दर्ज की। कुल मिलाकर वह 11 बार सांसद बने, जिनमें आठ बार लोकसभा और तीन बार राज्यसभा सदस्य रहे।
पूर्व CM शिबू सोरेन झारखंड आंदोलन के जनक
झारखंड राज्य के गठन के लिए उन्होंने दशकों तक आंदोलन चलाया। अलग राज्य की मांग को लेकर उन्होंने हजारों लोगों को संगठित किया और संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाया। उनके संघर्षों का ही परिणाम था कि वर्ष 2000 में बिहार से अलग होकर झारखंड राज्य बना। इसके बाद उन्होंने तीन बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने झारखंड के पहले आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में न केवल अपनी पार्टी बल्कि पूरे आदिवासी समाज को एक नई पहचान दी।
शिबू सोरेन की राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव
शिबू सोरेन की राजनीतिक यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए। एक समय वह केंद्र सरकार में मंत्री भी बने, वहीं कुछ मामलों में कानूनी विवादों में भी फंसे, लेकिन उन्होंने हर बार खुद को राजनीतिक रूप से पुनर्स्थापित किया। उनके नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) राज्य की सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय पार्टी बनकर उभरी। आज उनके पुत्र हेमंत सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री हैं और पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
शिबू सोरेन के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता
शिबू सोरेन के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने राजनीति को सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि समाजसेवा और आदिवासी उत्थान का रास्ता माना। उनका जीवन संघर्ष, साहस और नेतृत्व का प्रतीक बन गया है। उनके निधन से झारखंड ने न केवल एक नेता, बल्कि एक युग को खो दिया है।
राज्य भर में उनके योगदान को याद करते हुए श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित की जा रही हैं। लोग ‘गुरुजी’ को नम आंखों से विदा कर रहे हैं। झारखंड के गांवों से लेकर राजधानी रांची तक उनका नाम सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जा रहा है। उनके संघर्ष और आदर्शों की प्रेरणा आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाती रहेगी।


















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