आयकर विधेयक 2025: प्रवर समिति की 4000-पन्नों की रिपोर्ट में पारदर्शिता, सहूलियत और न्यायोचित कर-प्रबंधन पर ज़ोर
आयकर विधेयक 2025: प्रवर समिति की 4000-पन्नों की रिपोर्ट में पारदर्शिता, सहूलियत और न्यायोचित कर-प्रबंधन पर ज़ोर लोकसभा की प्रवर समिति के अध्यक्ष और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य वेदांत पांडा ने सोमवार को सदन में आयकर विधेयक 2025 पेश करते समय स्पष्ट किया कि प्रस्तावित क़ानून को अधिक सरल,आयकर विधेयक 2025 पारदर्शी और करदातामुखी बनाने का यह पहला ठोस क़दम है। संसदीय परम्परा के अनुसार मसौदा अब प्रवर समिति के पास विस्तृत अध्ययन और समीक्षा के लिए भेज दिया गया है। उसी प्रक्रिया के तहत समिति ने अपनी चार-हज़ार से ज़्यादा पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट में कई महत्त्वपूर्ण संशोधनों और सिफ़ारिशों का ज़िक्र किया, जिनका उद्देश्य मौजूदा कर-प्रक्रिया में व्यावहारिक सुधार लाना है।

आयकर विधेयक 2025: प्रवर समिति की 4000-पन्नों की रिपोर्ट में पारदर्शिता, सहूलियत और न्यायोचित कर-प्रबंधन पर ज़ोर
आयकर विधेयक 2025 : टीडीएस रिफ़ंड और रिटर्न जमा करने में लचीलापन
आयकर विधेयक 2025: प्रवर समिति ने ग़ैर-लाभकारी संगठनों को अज्ञात स्रोतों से प्राप्त दान पर प्रस्तावित 30 प्रतिशत कर के प्रावधान को भी एक अहम मुद्दा बताया। अपनी टिप्पणियों में समिति ने कहा कि चूँकि इन संस्थाओं की आय का एक बड़ा भाग परोपकारी एवं परोपकार-निगमित स्रोतों से आता है, अतः उन पर इतनी ऊँची दर से कर लगाने से समाज कल्याण सम्बन्धी परियोजनाएँ प्रभावित हो सकती हैं। साथ ही समिति ने स्पष्ट किया कि पारदर्शिता बनाये रखने के लिए ऐसे दानदाताओं का विवरण सुरक्षित रखे जाने की आवश्यकता से वह सहमत है, पर कर-छूट का सिलसिला जारी रहना चाहिए, ताकि सामाजिक क्षेत्र को वित्तीय अस्थिरता न झेलनी पड़े।
आयकर विधेयक 2025 : मकान-भाड़े की आय और अन्य तकनीकी परिभाषाएँ
आयकर विधेयक 2025 रिपोर्ट में आगे मकान से होने वाली आय की गणना की वर्तमान पद्धति को यथार्थ के अधिक समीप लाने की बात कही गयी है। समिति का तर्क है कि बदलती आर्थिक परिस्थितियों और किराया बाज़ार के उतार-चढ़ाव को देखते हुए ‘मासिक किराया’ और ‘ग्रीक अवधि’ जैसी पारम्परिक श्रेणियाँ अब मौजूदा व्यवहार को पूरी तरह प्रतिबिम्बित नहीं करतीं। इसलिए विधेयक में किराये के वास्तविक प्राप्तांश को प्राथमिकता देने तथा काल्पनिक किराया की अवधारणा को यथासम्भव सीमित करने की सिफ़ारिश की गयी है।
आयकर विधेयक 2025 के इसी क्रम में समिति ने ‘इन्फ़्रास्ट्रक्चर कैपिटल कम्पनी’ की परिभाषा स्पष्ट करने के निर्देश दिये हैं। उसका मानना है कि जब तक निवेश योग्य इकाइयों और परियोजनाओं की सूची सुस्पष्ट नहीं होगी, तब तक कर-छूट और निवेश प्रोत्साहन का लक्ष्य अधूरा रहेगा। पूँजी संपदा की श्रेणियों के वर्गीकरण से लेकर दीर्घ-कालिक और लघु-कालिक अनुग्रह की समय-सीमा तय करने तक कई बारीकियों को पुनर्परिभाषित करने की ज़रूरत समिति ने रेखांकित की है।
आयकर विधेयक 2025 एमएसएमई की नयी परिभाषा का सुझाव
टैक्स-नीति से जुड़े ‘शारीरीकरण’ यानी रूपान्तरण प्रावधान पर चर्चा करते हुए रिपोर्ट में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की नई परिभाषा को शामिल करने की सलाह दी गयी है। समिति का तर्क है कि परम्परागत मानक—जैसे निवेश सीमा या वार्षिक कारोबार—अब डिजिटल अर्थव्यवस्था और सेवा-उन्मुख व्यापार ढाँचे के कारण अप्रासंगिक हो रहे हैं। नयी परिभाषा से कर-छूट के दायरे में आने वाली इकाइयों की पहचान सरल होगी तथा भ्रम की स्थिति नहीं बनेगी।
आयकर विधेयक 2025 खोज एवं जाँच में डिजिटल अधिकारों का सवाल
आयकर विधेयक 2025 के संवैधानिक प्रावधानों पर भी समिति की नज़र गयी। एक चर्चित धारा में आयकर अधिकारियों को कर-जाँच के दौरान करदाता के लैपटॉप, ईमेल और अन्य डिजिटल दस्तावेज़ों तक पहुँच देने का अधिकार प्रस्तावित है। गोपनीयता से जुड़ी चिन्ताओं के बावजूद समिति ने उक्त धाराओं को सैद्धान्तिक स्वीकृति दे दी है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘डिजिटल युग में काले धन और कर-चोरी के आभासी रूपों का पता लगाना केवल पारम्परिक दस्तावेज़ी जाँच से सम्भव नहीं।’’ हालाँकि समिति ने यह भी रेखांकित किया कि डेटा-सुरक्षा मानदण्डों और न्यायिक पर्यवेक्षण के स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार किये बिना ऐसे प्रावधान लागू नहीं किये जाने चाहिए।
आगे की प्रक्रिया और सम्भावित प्रभाव
अब जब समिति ने अधिकतर संशोधनों पर सुझाव दाख़िल कर दिये हैं, लोकसभा में विधेयक पर क्लॉज़-वार चर्चा होने की सम्भावना है। चर्चा के बाद विधेयक यदि बिना व्यापक बदलाव के पारित होता है, तो कर-प्रबंधन प्रणाली में रणनीतिक परिवर्तन देखने को मिलेंगे—ख़ासतौर पर रिटर्न दाख़िल करने की समय-सीमा, टीडीएस रिफ़ंड, और सामाजिक-सेवा क्षेत्र से जुड़े प्रावधानों में। कर-साधारणीकरण के इन कदमों से सरकार को राजस्व-पोषण में सहूलियत मिलेगी और करदाताओं के लिए अनुपालन-लागत में कमी आ सकती है।
वर्तमान संसद-सत्र के दौरान आयकर विधेयक 2025 पर विचार पूरा होने की उम्मीद जताई जा रही है। रिपोर्ट का कुल लब्बोलुआब यह है कि ‘‘कर-प्रशासन की सरलता, पारदर्शिता और न्यायोचित कर-संग्रह’’—तीनों मोर्चों को एक साथ साधने के बिना आधुनिक अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटना सम्भव नहीं। इसलिए समिति की सिफ़ारिशें नये आयकर कानून को अधिक लोकतान्त्रिक और उत्तरदायी बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण आधारशिला के रूप में देखी जा रही हैं।
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