वन विभाग के अत्याचार के खिलाफ सड़क पर जाल, हांड़ी और डोंगा लेकर मौन मार्च — मछुआरों का प्रदर्शन

वन विभाग के अत्याचार के खिलाफ सड़क पर जाल, हांड़ी और डोंगा लेकर मौन मार्च — मछुआरों का प्रदर्शन
वन विभाग के कथित अत्याचार के विरोध में मछुआरे सड़क पर जाल, हांड़ी और ताड़ के डोंगा लेकर उतर आए। पहले नदी में ताड़ के डोंगा के साथ विरोध प्रदर्शन किया गया, उसके बाद सड़क अवरुद्ध कर मौन मार्च और धरना दिया गया। आज प्रदर्शन का 13वां दिन है और मछुआरों का धरना लगातार जारी है।
मछुआरों का आरोप है कि दिन-ब-दिन वन विभाग का अत्याचार बढ़ता जा रहा है। इसी विरोध में सुंदरबन से सटे कुलतली ब्लॉक के पूर्व गुड़गुड़िया इलाके में मछुआरों को सड़क पर जाल, केकड़ा पकड़ने के बर्तन, डोंगा और चप्पू के साथ शांतिपूर्ण मौन मार्च और धरना देते देखा गया। दक्षिण बंग मछुआरा फोरम की अगुवाई में यह प्रदर्शन हुआ, जिसमें गुड़गुड़िया डोंगा मछुआरा समिति की महिलाएँ भी शामिल हुईं।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुंदरबन के जंगली क्षेत्रों में मछली, केकड़ा और शहद संग्रह कर मछुआरे अपनी आजीविका चलाते आए हैं। लेकिन वर्तमान में उन पर वन विभाग का अत्याचार बढ़ने का आरोप लगाया जा रहा है। 21 नवंबर को सैकड़ों ताड़ के डोंगा लेकर मछुआरों ने कुलतली बीट ऑफिस का घेराव किया था और उसके बाद से वे लगातार धरना दे रहे हैं।
बताया गया कि कुलतली बीट के समीप भुवनेश्वरी स्थित धरना मंच को तोड़ दिया गया, जिसकी जानकारी मिलन दास और लीना खांड़ा ने दी। इसके विरोध में सोमवार और मंगलवार को मौन धरना दिया गया।
मछुआरों का कहना है कि विश्व मछुआरा दिवस से पहले ही उन पर अत्याचार किया गया। नून-पानी के लिए संघर्ष कर रहे परिवार जीविका के लिए मकरड़ी नदी और चितुड़ी जंगल से मछली, केकड़ा और शहद लाते हैं, लेकिन वन विभाग उनके जलयान जब्त कर लेता है और उन पर पैसों का बोझ डालता है। यहां तक कि मैंग्रोव पौधारोपण और पर्यावरण सौंदर्यीकरण के काम में लगाकर भी उन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जाती।
चितुड़ी जंगल में सैकड़ों मछुआरों ने डोंगा और नाव लेकर दक्षिण बंग मछुआरा फोरम के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया। आरोप है कि 250 रुपए लेने के बाद भी ताड़ के डोंगा का पास नहीं दिया जाता और जिस महीने पैसे न दिए जाएं उस महीने अत्याचार बढ़ा दिया जाता है — कभी नावें जब्त कर ली जाती हैं तो कभी जंगल में जाने से रोका जाता है।
राज्य महासचिव मिलन दास, लीना खांड़ा, नारायण दास और तापसी दलुई का कहना है कि सैकड़ों मछुआरे इस अत्याचार के शिकार हैं। शिप्रा सरदार, संका नस्कर, महारानी पायलान, अर्चना मंडल समेत कई मछुआरिनों ने भी इसी तरह की शिकायतें बताईं।
शुरुआत में पुलिस की मौजूदगी रही, लेकिन बाद में पुलिस निष्क्रिय हो गई। मछुआरों का कहना है कि जब तक वन विभाग उनके व्यक्तिगत मांगपत्र स्वीकार नहीं करता, तब तक धरना और विरोध जारी रहेगा।



















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